“दीये’ अंधकार को दूर करने के लिए जलते हैं और समर्पण की एक भावना पैदा करते हैं” : प्रधानमंत्री मोदी

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देश // दीपावली की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भव्य दीपोत्सव समारोह की शुरुआत की। कार्यक्रम में उपस्थित उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनन्दीबेन पटेल , यहां के लोकप्रिय, कर्मयोगी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ , सभी पूज्य संत गण, उपस्थित थे प्रधानमंत्री ने भव्य म्यूजिकल लेज़र शो के साथ-साथ सरयू नदी के तट पर राम की पैड़ी में 3-डी होलोग्राफिक प्रोजेक्शन मैपिंग शो भी देखा।

प्रधानमंत्री ने भगवान राम की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि आज अयोध्या जी दीपों से दिव्य हैं और भावनाओं से भव्य हैं। प्रधानमंत्री ने कहा “आज अयोध्या नगरी भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के स्वर्णिम अध्याय का प्रतिबिंब है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि जब वे पहले यहां राज्यभिषेक के लिए आए थे तो उनके अंदर भावनाओं की लहरें दौड़ रही थीं। प्रधानमंत्री ने इस बात पर प्रशंसावश आश्चर्य व्यक्त किया कि जब भगवान श्री राम 14 वर्ष के वनवास के बाद लौटे होंगे तो अयोध्या को किस प्रकार सजाया गया होगा। उन्होंने टिप्पणी की, “आज इस अमृत काल में भगवान राम के आशीर्वाद से हम अयोध्या की दिव्यता और अमरता के साक्षी बन रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि हम उन परंपराओं और संस्कृतियों के वाहक हैं जिनमें त्योहार और उत्सव लोगों के जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा, “हर सत्य की जीत और हर झूठ की हार के बारे में मानवता के संदेश को जिंदा रखने के मामले में भारत का कोई मुकाबला नहीं है।” उन्होंने कहा, “दीपावली के ये दीपक भारत के आदर्शों, मूल्यों और दर्शन के जीवंत ऊर्जापुंज हैं। ज्योतियों की ये जगमग और प्रकाश का ये प्रभाव भारत के मूल मंत्र – ‘सत्यमेव जयते’ की उद्घोषणा है।”

इस बार दीपावली एक ऐसे समय में आई है, जब हमने कुछ समय पहले ही आजादी के 75 वर्ष पूरे किए हैं, हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। आजादी के इस अमृतकाल में भगवान राम जैसी संकल्पशक्ति, देश को नई ऊंचाई पर ले जाएगी। भगवान राम ने अपने वचन में, अपने विचारों में, अपने शासन में, अपने प्रशासन में जिन मूल्यों को गढ़ा, वो सबका साथ-सबका विकास की प्रेरणा हैं और सबका विश्वास-सबका प्रयास का आधार भी हैं। अगले 25 वर्षों में विकसित भारत की आकांक्षा लिए आगे बढ़ रहे हम हिंदुस्तानियों के लिए, श्रीराम के आदर्श, उस प्रकाश स्तंभ की तरह हैं, जो हमें कठिन से कठिन लक्ष्यों को हासिल करने का हौसला देंगे।

इस बार लाल किले से मैंने सभी देशवासियों से पंच प्राणों को आत्मसात करने का आह्वान किया है। इन पंच प्राणों की ऊर्जा जिस एक तत्व से जुड़ी हुई है, वो है भारत के नागरिकों का कर्तव्य। आज अयोध्या नगरी में, दीपोत्सव के इस पावन अवसर पर हमें अपने इस संकल्प को दोहराना है, श्रीराम से जितना सीख सकें, सीखना है। भगवान राम, मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं। मर्यादा, मान रखना भी सिखाती है और मान देना भी सिखाती है। और मर्यादा, जिस बोध की आग्रही होती है, वो बोध कर्तव्य ही है। हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है- “रामो विग्रहवान् धर्मः”॥ अर्थात्, राम साक्षात् धर्म के, यानी कर्तव्य के सजीव स्वरूप हैं। भगवान राम जब जिस भूमिका में रहे, उन्होंने कर्तव्यों पर सबसे ज्यादा बल दिया। वो जब राजकुमार थे, तो ऋषियों की, उनके आश्रमों और गुरुकुलों की सुरक्षा का कर्तव्य निभाया। राज्याभिषेक के समय पर श्रीराम ने एक आज्ञाकारी बेटे का कर्तव्य निभाया। उन्होंने पिता और परिवार के वचनों को प्राथमिकता देते हुए राज्य के त्याग को, वन जाने को अपना कर्तव्य समझकर स्वीकार किया। वो वन में होते हैं, तो वनवासियों को गले लगाते हैं। आश्रमों में जाते हैं, तो माँ सबरी का आशीर्वाद लेते हैं। वो सबको साथ लेकर लंका पर विजय प्राप्त करते हैं, और जब सिंहासन पर बैठते हैं, तो वन के वही सब साथी राम के साथ खड़े होते हैं। क्योंकि, राम किसी को पीछे नहीं छोड़ते। राम कर्तव्यभावना से मुख नहीं मोड़ते। इसीलिए, राम, भारत की उस भावना के प्रतीक हैं, जो मानती है कि हमारे अधिकार हमारे कर्तव्यों से स्वयं सिद्ध हो जाते हैं। इसलिए हमें कर्तव्यों के प्रति समर्पित होने की जरूरत है। और संयोग देखिए, हमारे संविधान की जिस मूलप्रति पर भगवान राम, माँ सीता और लक्ष्मण जी का चित्र अंकित है, संविधान का वो पृष्ठ भी मौलिक अधिकारों की बात करता है। यानी, एक ओर हमारे संवैधानिक अधिकारों की गारंटी, तो साथ ही प्रभु राम के रूप में कर्तव्यों का शाश्वत सांस्कृतिक बोध! इसीलिए, हम जितना कर्तव्यों के संकल्प को मजबूत करेंगे, राम जैसे राज्य की संकल्पना उतनी ही साकार होती जाएगी।

आज़ादी के अमृतकाल में देश ने अपनी विरासत पर गर्व और गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का आवाहन किया है। ये प्रेरणा भी हमें प्रभु श्रीराम से मिलती है। उन्होंने कहा था- जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। यानी, वो स्वर्णमयी लंका के सामने भी हीनभावना में नहीं आए, बल्कि उन्होंने कहा कि माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। इसी आत्मविश्वास के साथ जब वो अयोध्या में लौटकर आते हैं तब अयोध्या के बारे में कहा जाता है- “नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई”॥ यानी, अयोध्या की तुलना स्वर्ग से की गई है। इसीलिए भाइयों बहनों, जब राष्ट्र निर्माण का संकल्प होता है, नागरिकों में देश के लिए सेवा भाव होता है तो भी और तभी राष्ट्र विकास की असीम ऊंचाइयों को छूता है। एक समय था, जब राम के बारे में, हमारी संस्कृति और सभ्यता के बारे में बात करने तक से बचा जाता था। इसी देश में राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाए जाते थे। उसका परिणाम क्या हुआ? हमारे धार्मिक, सांस्कृतिक स्थान और नगर पीछे छूटते चले गए। हम यहीं अयोध्या के रामघाट पर आते थे तो दुर्दशा देखकर मन दुःखी हो जाता था। काशी की तंगहाली, वो गंदगी और वो गलियाँ परेशान कर देती थी। जिन स्थानों को हम अपनी पहचान का, अपने अस्तित्व का प्रतीक मानते थे, जब वही बदहाल थे, तो देश के उत्थान का मनोबल अपने आप टूट जाता था।

प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि जब हम स्वार्थ से ऊपर उठते हैं तो सर्व-समावेशन का संकल्प स्वतः ही इसमे समा जाता है। उन्होंने कहा, “जब हमारे विचार साकार हो जाते हैं, तो हम कहते हैं कि ये उपलब्धि मेरे लिए नहीं है, बल्कि ये मानव जाति के कल्याण के लिए है। दीप से दीपावली तक यही भारत का दर्शन है, यही भारत का विचार है और भारत की सनातन संस्कृति है। प्रधानमंत्री ने टिप्पणी की कि भले ही भारत ने मध्यकाल और आधुनिककाल तक कितने ही अंधकार भरे युगों का सामना किया, लेकिन देशवासियों ने कभी भी दीप जलाना बंद नहीं किया और विश्वास निर्मित करना कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने याद किया कि कोरोना की मुश्किलों के दौरान हर भारतीय एक समान भावना के साथ दीया लेकर खड़ा हुआ और दुनिया इस महामारी के खिलाफ भारत की लड़ाई की गवाह है। प्रधानमंत्री ने अंत में कहा, “भारत अतीत में हर अंधेरे से बाहर आया है और उसने प्रगति के पथ पर अपनी शक्ति का प्रकाश फैलाया है।”

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