जामुल। आरएसएस दुर्ग विभाग द्वारा आयोजित घोष शिविर के समापन मे विभाग के विभिन्न स्थानों से 65 स्वयंसेवको ने घोष वाद्य यंत्र आनक, वेणु,संख, पणव ,आदि बजाने को सीखे तथा देवनगर जामुल से शिवपुरी होते हुए पथ संचलन में स्वयंसेवको द्वारा घोष का वादन किया गया।
कार्यक्रम के समापन समारोह में विभाग प्रचारक कमल राठौर,ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थापना 1925 में हुई। एक रोचक तथ्य यह है कि संघ का नामकरण इसकी स्थापना के बाद सर्व सम्मति या कहें कि उस समय के स्वयंसेवकों के सामूहिक निर्णय से हुआ। संघ कार्य का विस्तार भी देश, काल व परिस्थिति के अनुरूप समाजोपयोगी व प्रासंगिकता के अनुरूप बड़ी सहजता से होता गया। केवल व्यायाम व सामान्य चर्चा से आरंभ हुई शाखा में धीरे-धीरे शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रम होने लगे। शारीरिक व्यायाम में धीरे-धीरे समता और संचलन का अभ्यास आरंभ हुआ।
संचलन के समय शारीरिक विभाग ने विचार किया कि यदि संचलन के साथ घोष वाद्य का प्रयोग किया जाए तो इसकी रोचकता, एकरूपता, सांगिकता व उत्साह में चमत्कारिक परिवर्तन हो सकता है। यह स्वयंसेवकों की इच्छाशक्ति का ही परिणाम था कि संगठन की स्थापना के मात्र दो वर्ष बाद 1927 में शारीरिक विभाग में घोष भी शामिल हो गया। राठौर ने कहा कदम से कदम मिलाकर चलो , स्वर में स्वर मिला कर बोलो , तुम्हारे मनों मे समाज बोध हो। इसी भाव को धारण कर हमें सतत सीखने का प्रयास करे। इस दौरान विभाग शारिरिक प्रमुख दिलेश्वर उमरे , शिवेंद्र शिंदे, सुबोध ताम्रकार, शंशाक उमरे, योगेंद कुमार उपस्थित रहे।






