- खाईवालों तक नहीं पहुंचती वर्दी
- कल्याण राजधानी में लग रहे लाखों के दांव
- सट्टा माफिया हो रहे मालामाल
- गिरोह के हौसले बुलंद
धमधा। सट्टेबाजी की दुनिया में शुरू से ही धमधा क्षेत्र बदनाम है। जानकारी के अनुसार नगर व आसपास क्षेत्र व नगर में जमकर सट्टा लग रहा है, और पुलिस प्रशासन है, की इन सट्टेबाजों पर कोई नकेल नहीं कस पा रही है । जिसका जमकर फायदा उठा रहे हैं । जबकि पुलिस प्रशासन का फर्ज है, की वह इन सट्टेबाजों के खिलाफ कार्यवाही करें, परंतु वह ऐसा नहीं कर रही है ।
जिसकी वजह से धमधा नगर सहित पूरे क्षेत्र में सट्टेबाजों का सबसे बड़ा गढ़ बन गया है।नगर में इन दिनों सट्टे का अवैध कारोबार जोर शोर से चल रहा है। एक रुपए को अस्सी रुपया बनाने के चक्कर में खासकर युवा वर्ग अधिक बर्बाद हो रहे हैं।सट्टा व्यापार के लालच में फंसकर कई लोग अपनी किस्मत आजमाते है। बाद में इसमें फंसकर अपना सबकुछ भी गवां बैठते है। पुलिस इस अवैध कारोबार में को संचालित करने वालों पर कार्यवाही न कर उनके गुर्गाे पर कार्यवाही कर अपनी पीठ थपथपा लेती है, सरगना पर कार्यवाही न होने की वजह से इस गोरखधंधे पर पूरी तरह अंकुश नही लग पा रहा है और अवैध कारोबार में लिप्त गिरोह के लोगो के हौंसले बुलंद हैं। शहर में यह कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है।
सूत्रों के मुताबिक लोग फोन पर अपना नंबर बताते लिखवाते हैं और नंबर आने पर इन्हीं सट्टा खाईवाल एजेंटों के माध्यम से पैसे का लेन-देन किया जाता है।सट्टा का यह खेल जीरो से लेकर नौ नंबर तक चलता है और नेट पर एक ही नंबर आता है, जिससे नौ नंबरों का रुपये उन्हें सीधा-सीधा बच जाता है, जिससे खिलाडी का वह नंबर फंसता है, वह इसमें खुश हो जाता है कि उसे 1 के 80 मिल गये, लेकिन अन्य बाकी खिलाडियों के रुपये जिनके नंबर नहीं फंसते उनका सीधा रुपये सट्टा माफियाओं की जेब में जाता है। अब इस कारोबार का जाल पूरे शहर में फैल रहा है। ऐसा नहीं है कि पुलिस सट्टे, जुएं के इस अवैध कारोबार पर अंकुश नहीं लगा सकती। कुछ पुलिस अधिकारी ऐसे भी आएं जिन्होंने सट्टे के कारोबार को पूरी तरह बंद करा दिया था।कामकाज की उम्र में युवा वर्ग लालच में फंस रहे हैं, परिवार व परिजनों से राशि उधार लेने के बाद सट्टे में लगाकर कर्ज तले दब जाते हैं।इसका गुणा भाग कर ग्राहक सट्टे की चपेट में बुरी तरह से फंस कर पैसा इस अवैध कारोबार में गंवा रहा है। अगर पुलिस चुस्त है तो, सट्टा का यह कारोबार पुलिस की नाक के नीचे और विभाग की जानकारी में ही फल-फूल रहा होगा। अब देखना यह है कि इस कारोबार पर फिर पूर्णत: अंकुश लग पाता है या नहीं। या फिर छोटे एजेंटों को पकड कर बड़े खाईवालों को बचाने का प्रयास किया जाता है।राजनैतिक पहुंच और पुलिस से सांठ-गांठ के चर्चे किसी से छुपे नहीं हैं।
कैबिनेट स्तर पर संरक्षण प्राप्त
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ताकतवर गिरोह के पीछे कैबिनेट स्तर तक संरक्षण प्राप्त है, इसीलिए पुलिस उन्ही लोगों को टारगेट करती है जो इनके खिलाफ पैर जमाने की कोशिश करते हैं, गिरोह की टिप पर इन्हें उठाया जाता है और फिर शुरू होता है सौदेबाजी का सिलसिला । जो मोटी रकम देने मान जाता उसे छोड़ दिया जाता है और जो नही दे पाता उसके खिलाफ कार्यवाही की जाती है।
सेटिंग में चल रहा खेल
पुलिस और इनकी सेटिंग इतनी तगड़ी है कि ऊपर अधिकारियों को दिखाने ये खाईवाल अपने गुर्गों के नाम प्रकरण बनवा देता है, ऊपर बैठे अफसरों को लगता है पुलिस कार्रवाई कर रही है। जबकि वास्तव में ये सांठगांठ का एक पहलू होता है। सवाल ये है कि जब पुलिस अगर सटोरियों के गुर्गों के खिलाफ कार्रवाई करती है तो, फिर उनसे पूछताछ कर खाईवालों तक क्यों नहीं पहुंच पाती।






